भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE), देहरादून तथा इसके नौ संबद्ध संस्थान महत्वपूर्ण वानिकी वृक्ष प्रजातियों की उपज, गुणवत्ता, प्रतिरोधक क्षमता, अनुकूलनशीलता एवं उत्पादकता में वृद्धि के उद्देश्य से वृक्ष सुधार कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। इन कार्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य घरेलू उपयोग एवं औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की बढ़ती मांग को पूरा करना है।
आनुवंशिक रूप से उन्नत रोपण सामग्री के विकास एवं प्रसार की दिशा में अपने निरंतर प्रयासों के अंतर्गत, ICFRE के पाँच संस्थानों—ICFRE-वन आनुवंशिकी एवं वृक्ष प्रजनन संस्थान (IFGTB), कोयंबटूर; ICFRE-उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान (TFRI), जबलपुर; ICFRE-वन जैव विविधता संस्थान (IFB), हैदराबाद; ICFRE-वन उत्पादकता संस्थान (IFP), रांची तथा ICFRE-काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, बेंगलुरु—द्वारा कैजुअरीना (Casuarina), सागौन (Tectonagrandis), कदंब (Neolamarckia cadamba), मेलिया डुबिया (Melia dubia) तथा फ्लेमिंगिया सेमियालाटा (Flemingia semialata) की उच्च उत्पादकता वाली क्लोनों एवं किस्मों का विकास एवं मूल्यांकन किया गया है।
11 सितंबर 2026को आयोजितकिस्म विमोचन समिति (Variety Releasing Committee–VRC)की बैठक में,श्री सुशील कुमार अवस्थी, वन महानिदेशकएवं विशेष सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC), भारत सरकारकी अध्यक्षता तथाश्रीमती कंचन देवी, महानिदेशक, ICFREकी सह-अध्यक्षता में इन महत्वपूर्ण वानिकी प्रजातियों की18 उन्नत किस्मों/क्लोनों के विमोचन को मंजूरीप्रदान की गई।
ICFRE-वन आनुवंशिकी एवं वृक्ष प्रजनन संस्थान (IFGTB), कोयंबटूर ने कैजुअरीना की दो उत्कृष्ट क्लोन—IFGTB-CH-2 तथा IFGTB-CH-5—विकसित की हैं। इन क्लोनों का मूल्यांकन ICFRE-IFGTB, कोयंबटूर; ICFRE-TFRI, जबलपुर तथा ICFRE-IFB, हैदराबाद की क्षेत्रीय किस्म परीक्षण समितियों (Regional Variety Testing Committees—RVTCs) द्वारा किया गया तथा इन्हें अनुशंसित किया गया। परिणामस्वरूप, उक्त दोनों किस्मों को पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर विमोचन के लिए अनुशंसित किया गया।
ICFRE-वन उत्पादकता संस्थान (IFP), रांची ने मेलिया डुबिया की पाँच उन्नत किस्मों तथा फ्लेमिंगिया सेमियालाटा की दो उन्नत किस्मों का विकास किया है। क्षेत्रीय किस्म परीक्षण समिति द्वारा इनके मूल्यांकन एवं अनुशंसा के पश्चात इन किस्मों को क्षेत्रीय स्तर पर विमोचन के लिए अनुशंसित किया गया।
ICFRE-वन आनुवंशिकी एवं वृक्ष प्रजनन संस्थान (IFGTB), कोयंबटूर ने सागौन (Tectona grandis) की तीन उन्नत क्लोनों तथा कदंब (Neolamarckia cadamba) की तीन उन्नत क्लोनों का भी विकास किया है। इन क्लोनों को संस्थान की क्षेत्रीय किस्म परीक्षण समिति द्वारा मूल्यांकन एवं अनुशंसा के पश्चात क्षेत्रीय विमोचन के लिए अनुशंसित किया गया है।
इसके अतिरिक्त, पहली बार लकड़ी की गुणवत्ता के आकलन के आधार पर, भा.वा.अ.शि.प.-काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान(IWST), बेंगलुरु की क्षेत्रीय किस्म परीक्षण समिति ने आंध्र प्रदेश वन विभाग के सहयोग से विकसितTectona grandisकी तीन उन्नत क्लोनों के क्षेत्रीय विमोचन की सिफारिश की है।
इन उन्नत किस्मों एवं क्लोनों का विकास और विमोचन, रोपण वानिकी, कृषि वानिकी तथा औद्योगिक लकड़ी उत्पादन के लिए गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की उपलब्धता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान है। इन उन्नत आनुवंशिक सामग्रियों से उत्पादकता में वृद्धि, विकास प्रदर्शन तथा आर्थिक लाभ में सुधार होने की अपेक्षा है। साथ ही, यह सतत वानिकी को बढ़ावा देने तथा वन-आधारित कच्चे माल की बढ़ती मांग को पूरा करने में भी सहायक होगा।
किस्म विमोचन समितिकी बैठक में श्री सुभारंजन सेन, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख (PCCF & HoFF), मध्य प्रदेश; श्री एच. वेणुप्रसाद, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF), तमिलनाडु; डॉ. वीणा गुप्ता, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR); डॉ. सी. एन. पांडेय, प्रधान तकनीकी सलाहकार, एफआईपीपीआई (FIPPI); डॉ. एच. एस. गिनवाल, उप महानिदेशक (अनुसंधान), भा.वा.अ.शि.प. तथा वीआरसी के सदस्य सचिव; भा.वा.अ.शि.प. के विभिन्न संस्थानों के निदेशक; डॉ. पी. एस. रावत, सहायक महानिदेशक (अनुसंधान एवं योजना), भा.वा.अ.शि.प. ; तथा संबंधित परियोजनाओं के प्रधान अन्वेषकों ने भाग लिया।
तमिलनाडु के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं प्रधान मुख्य वन्यजीव संरक्षक (PCCF & HoFF) तथा डॉ. सलील कुमार तिवारी, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, वन आनुवंशिकी, जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर ने बैठक में ऑनलाइन माध्यम से भाग लिया।
इन उन्नत किस्मों/क्लोनों का विमोचन भा.वा.अ.शि.प.द्वारा संचालित वृक्ष सुधार कार्यक्रमों को सुदृढ़ करने तथा आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ रोपण सामग्री के व्यापक प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इससे देश में सतत वानिकी, उत्पादकता वृद्धि तथा वन-आधारित औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।





