विकसित भारत@2047 के लिए वृक्ष सुधार पर क्षेत्रीय अनुसंधान सम्मेलन 2026।

देहरादून, 21 अगस्त 2026:उत्पादकता वृद्धि के लिएविकसित भारत@2047 के लिए वृक्ष सुधार की वर्तमान स्थिति, चुनौतियाँ एवं भावी संभावनाएँविषय पर क्षेत्रीय अनुसंधान सम्मेलन (RRC)-2026 का आयोजन आईसीएफआरई–हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान (HFRI), शिमला द्वारा आईसीएफआरई–वन अनुसंधान संस्थान (FRI), देहरादून के सहयोग से हाइब्रिड माध्यम में किया गया। सम्मेलन में वानिकी शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों तथा वन विभागों के अधिकारियों ने प्रतिभाग किया और वृक्ष सुधार, जलवायु-सहिष्णु वानिकी तथा सतत उत्पादकता को सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया।

उद्घाटन सत्र को डॉ. मनीषा थपलियाल, निदेशक, आईसीएफआरई–एचएफआरआई, शिमला; श्रीमती ऋचा मिश्रा, आईएफएस, निदेशक, आईसीएफआरई–एफआरआई, देहरादून; डॉ. एच.एस. गिनवाल, उप महानिदेशक (अनुसंधान), आईसीएफआरई; डॉ. सुधीर कुमार, उप महानिदेशक (विस्तार), आईसीएफआरई तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. संजय सूद, आईएफएस, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं होफ, हिमाचल प्रदेश वन विभाग द्वारा संबोधित किया गया। श्रीमती कंचन देवी, आईएफएस, महानिदेशक, आईसीएफआरई ने सम्मेलन का उद्घाटन संबोधन दिया।

तकनीकी सत्र-I उत्पादकता वृद्धि के लिए वृक्ष सुधार, आनुवंशिक संसाधन एवं गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्रीपर केंद्रित रहा। सत्र में एचएफआरआई एवं एफआरआई की अनुसंधान पहलों, वृक्ष सुधार एवं वन आनुवंशिक संसाधनों में प्रगति तथा वन आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण एवं सतत प्रबंधन में जैव-प्रौद्योगिकीय एवं शारीरिक हस्तक्षेपों पर प्रस्तुतियाँ दी गईं। डॉ. मनीष सिंह भंडारी, प्रमुख, आनुवंशिकी एवं वृक्ष सुधार प्रभाग, एफआरआई नेEucalyptus, Corymbia, नीम, Melia, शीशम, बाँस, रिंगाल, तून सहित अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक, औषधीय एवं कृषि-वानिकी वृक्ष प्रजातियों में वृक्ष सुधार कार्यक्रमों की प्रगति पर प्रकाश डाला। डॉ. राजेंद्र के. मीणा ने वन आनुवंशिक संसाधनों की स्थिति एवं उनसे संबंधित पहलों की जानकारी प्रस्तुत की। सत्र में हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड वन विभागों के साथ भी संवाद हुआ। डॉ. विनय भार्गव, वन संरक्षक, ने उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करते हुए वृक्ष सुधार एवं अनुसंधान नियोजन में भौगोलिक एवं स्थल-विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया। श्री सुरेंद्र, प्रभागीय वनाधिकारी, हमीरपुर ने हिमाचल प्रदेश के परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करते हुए एचएफआरआई, एफआरआई एवं राज्य वन विभागों के बीच अनुसंधान सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

तकनीकी सत्र-II जलवायु सहनशीलता, कृषि उत्पादकता एवं सतत आजीविका के लिए वृक्ष सुधारविषय पर केंद्रित रहा। इसमें औषधीय वृक्षों की उत्पादकता, कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने वाले बहुउद्देशीय वृक्ष, औद्योगिक लकड़ी की सुरक्षा के लिए क्लोनल वानिकी, हिमालयी आनुवंशिक विविधता, जम्मू के उपोष्ण क्षेत्रों में वृक्ष सुधार तथा निम्नीकृत भूमि के पुनर्वास में कृषि-वानिकी जैसे विषयों पर प्रस्तुतियाँ दी गईं। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब के वन विभागों के प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय वानिकी अनुसंधान की प्राथमिकताओं एवं उभरती चुनौतियों पर चर्चा में भाग लिया।

सम्मेलन से यह प्रमुख निष्कर्ष उभरकर सामने आया कि केवल वृक्षारोपण लक्ष्यों तक सीमित रहने के बजायसुदृढ़, उत्पादक एवं आनुवंशिक रूप से विविध वन परिदृश्योंके विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। इसके लिए स्थल-विशिष्ट प्रजाति एवं प्रोवेनेंस चयन, आनुवंशिक विविधता का संरक्षण एवं उपयोग, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, प्राकृतिक पुनर्जनन, जलवायु-स्मार्ट नर्सरी प्रौद्योगिकियों तथा दीर्घकालिक निगरानी को बढ़ावा देना आवश्यक है। विचार-विमर्श में जलवायु–प्रजाति अनुकूलता आकलन, प्रोवेनेंस एवं प्रोजेनी परीक्षण, उन्नत नर्सरी तकनीक, पुनर्स्थापना की आर्थिक व्यवहार्यता, डिजिटल वन निगरानी, तथा अनुसंधान एवं क्षेत्रीय कार्यों के बीच मजबूत समन्वय पर विशेष बल दिया गया।

सम्मेलन का समापन विस्तृत चर्चा एवं समापन सत्र के साथ हुआ, जिसमें उत्पादकता वृद्धि, जलवायु सहनशीलता, वन आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण तथा सतत आजीविका के लिए सहयोगात्मक एवं आवश्यकता-आधारित अनुसंधान कार्यक्रमों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। RRC ने वैज्ञानिक विशेषज्ञता एवं क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को एक मंच पर लाने तथा वृक्ष सुधार के क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रगति कोविकसित भारत@2047की राष्ट्रीय परिकल्पना के अनुरूप व्यावहारिक रणनीतियों में परिवर्तित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

आईसीएफआरई–एफआरआई, देहरादून की ओर से डॉ. डी.पी. खली, डॉ. संतोष बार्थवाल, डॉ. विकास राणा, डॉ. तारा चंद, डॉ. हुकुम, डॉ. शांभवी एवं डॉ. श्रुति ने शोधार्थियों एवं तकनीकी स्टाफ के साथ तकनीकी सत्रों में प्रतिभाग किया। उनकी सहभागिता से वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान तथा वृक्ष सुधार, वन आनुवंशिक संसाधनों, जलवायु सहनशीलता एवं सतत वानिकी के क्षेत्रों में संस्थागत एवं अंतर-राज्यीय सहयोग को और मजबूत करने में योगदान मिला।

 

 

    August 21, 2026
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